अनुराधा, खोजी संवाददाता
नई दिल्ली — वापकोस लिमिटेड — जल शक्ति मंत्रालय के अधीन परामर्श उपक्रम — की वर्तमान अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक शिल्पा शिंदे की कोलकाता यात्रा के आसपास कंपनी एक पूर्व सीएमडी, देबीदास दत्ता, को फिर से भीतर ले आई। सूत्रों के अनुसार उनका काम पश्चिम बंगाल सरकार के साथ कंपनी के हितों का प्रतिनिधित्व और "सुविधा" करना था — दरवाज़े खुलवाना, असाइनमेंट ढूँढना, काम घर लाना।
इस पद के लिए कोई विज्ञापन नहीं। बोर्ड का कोई प्रस्ताव नहीं। न नियुक्ति-पत्र, न कार्य-शर्तें, न शुल्क, न हितों के टकराव की कोई घोषणा — ऐसा कुछ भी नहीं जिसे कंपनी दिखाने को तैयार हो। किसने यह नियुक्ति प्रस्तावित की, किसने मंज़ूर की और इसकी लागत क्या है — इन सवालों पर वापकोस ने सिर्फ़ चुप्पी दी है।
चुप्पी एक चुनाव है। एक पूर्व मुख्य कार्यकारी की लायज़न भूमिका या तो एक सामान्य परामर्श है जिसके पीछे फ़ाइल है, या फिर कुछ और है। फ़र्क़ सिर्फ़ फ़ाइल बता सकती है — और फ़ाइल वापकोस के कब्ज़े में है।
मेज़ पर कौन बैठा था
सूत्र इस व्यवस्था के बिचौलिये के रूप में जो नाम जोड़ते हैं, वह है सुमिर चावला — वही सुमिर चावला जिसका नाम राजस्थान की एफआईआर संख्या 51/2023 (थाना गुढ़ा, झुंझुनूं; आईपीसी 420, 506, 120-बी) में फ़र्ज़ी शिकायत-वापसी पत्रों के मामले में दर्ज है, और 13 अप्रैल 2023 की उस मूल शिकायत में भी जो अंततः सीबीआई को वापकोस के दरवाज़े तक ले आई।
दत्ता के इर्द-गिर्द सूत्र अमिताभ त्रिपाठी को रखते हैं, जिन्हें उनका क़रीबी सहयोगी बताया जाता है, और रजनीकांत अग्रवाल को — वह सीएमडी जिसे वापकोस ने बर्ख़ास्त किया और जो अब 30 अप्रैल 2026 की सीबीआई एफआईआर RC2162026A0005 में अकेला अभियुक्त है — जिन पर आरोप है कि वे दत्ता के साथ मिलकर काम करते थे और ठेकेदारों के कमीशन के माध्यम थे। दीपक लखनपाल उन नामों का घेरा पूरा करते हैं जो पहले से विजिलेंस के रडार पर हैं।
यही कंपनी की समस्या है, एक वाक्य में: जिस आदमी को कथित तौर पर सरकारी काम जीतने के लिए वापस लाया गया, वह उन्हीं लोगों से घिरा है जिन तक सीबीआई, राजस्थान पुलिस और वापकोस के अपने शिकायतकर्ता तीन साल से पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।
यह कड़ी कैसे काम करती है
सूत्र एक ऐसा क्रम बताते हैं जिसे कोई भी विजिलेंस अधिकारी पहचान लेगा। किसी राज्य सरकार के निर्णयकर्ताओं तक पहुँच। एक असाइनमेंट की पहचान या उसका रुख़ मोड़ना। वापकोस का प्रस्ताव जमा होना और मंज़ूर होना। क्रियान्वयन निजी सलाहकारों, ठेकेदारों या उप-ठेकेदारों को सौंप देना। यह सब कराने वाले बिचौलियों और जुड़े लोगों को भुगतान। और अंत में, असली लाभार्थियों को काग़ज़ से बाहर रखना।
इस कड़ी का हर जोड़ एक रिकॉर्ड छोड़ता है — यात्रा-कार्यक्रम, फ़ाइल नोटिंग, मंज़ूरी, नियुक्ति-पत्र, प्रस्ताव, अवार्ड, उप-ठेका, बिल, बैंक प्रविष्टि। वापकोस के पास ये सब हैं। उसने एक भी नहीं दिखाया।
पैसे का पीछा कीजिए
क्या दत्ता निश्चित शुल्क पर थे, रिटेनर पर, या जो काम वे लाते उसमें हिस्से पर? भुगतान उन्हें हुआ, किसी संस्था को, या बिचौलिये के ज़रिये? क्या यात्रा, आतिथ्य और "फ़ैसिलिटेशन" के ख़र्च की प्रतिपूर्ति हुई — और किस डिलिवरेबल के बदले? क्या पूर्व वापकोस अधिकारियों से जुड़े किसी व्यक्ति या संस्था को कोई भुगतान हुआ? शुल्क, रिटेनर या ठेके में हिस्सा — नियुक्ति-पत्र बता देगा। इसीलिए यह मायने रखता है कि उसे कोई दिखा नहीं रहा।
सीबीआई पहले से दरवाज़े पर है
30 अप्रैल 2026 को सीबीआई ने अग्रवाल के विरुद्ध आईपीसी की धारा 120-बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 7 और 11 के अंतर्गत एफआईआर RC2162026A0005 दर्ज की — भ्रष्टाचार, पद का दुरुपयोग, अवैध लाभ, वापकोस और एनपीसीसी का दुरुपयोग। वे इसके एकमात्र अभियुक्त हैं। जिन शिकायत-अभिलेखों से यह एफआईआर निकली, और राजस्थान की एफआईआर, उनमें चावला, संजय बोहिदार, अवतार सिंह, मनीषा धनखड़ और पी.पी. भारद्वाज के नाम फ़र्ज़ी वापसी-पत्रों और शिकायतकर्ताओं को धमकाने के आरोपों में दर्ज हैं। सीबीआई के मामले में इनमें से कोई प्रमुखता से नहीं है।
यानी कोलकाता की यह नियुक्ति एक ऐसी कंपनी पर आई है जिसका विजिलेंस तंत्र ख़ुद जाँच के घेरे में है, जिसे ऐसा प्रबंधन चला रहा है जिसकी चावला और प्रदीप कुमार से निकटता अप्रैल से रिपोर्ट हो रही है — और जिसके कथित "फ़िक्सर" की सीबीआई ने अभी जाँच ही नहीं की। जो विजिलेंस तंत्र ख़ुद जाँच के अधीन हो, वह अपनी जाँच नहीं कर सकता।
सलाहकार पूरी क़ीमत पर, कर्मचारी आधी पर
दत्ता की नियुक्ति कोई इकलौती घटना नहीं है। यह एक सूची की ताज़ा प्रविष्टि है। पिछले एक साल में वापकोस ने सलाहकार, परामर्शदाता और निजी तौर पर नियुक्त वकील रखे हैं — बिना विज्ञापन, बिना प्रतिस्पर्धी मूल्यांकन, बिना किसी दर्ज उचित-परिश्रम के — ऐसे वेतन, रिटेनर और सुविधाओं पर जिनके बारे में कंपनी के अपने लोग सिर्फ़ पढ़ सकते हैं। इस अख़बार के संस्करण 218 ने भीतरी सूत्रों का अनुमान छापा था कि प्रबंधन के चुने हुए वकीलों पर ही लगभग ₹1 करोड़ प्रति माह जा रहा है — उस कंपनी में जिसने दिल्ली उच्च न्यायालय के सामने ग़रीबी की दुहाई दी थी।
वापकोस की परियोजनाएँ वास्तव में पूरी करने वाले नियमित और संविदा कर्मचारी आयातित प्रतिभा के मुकाबले लगभग आधे वेतन पर काम करते हैं, उनकी सुविधाएँ रोकी गई हैं और 195 नियमित किए गए कर्मचारियों को कारण-बताओ नोटिस थमाए गए हैं। अघोषित रिटेनर पर एक पूर्व सीएमडी इस तस्वीर में कोई अपवाद नहीं है। यही कारोबार का तरीक़ा है।
असली जाँच क्या करेगी
एफआईआर पढ़कर रुक नहीं जाएगी। वह दत्ता की नियुक्ति को प्रवेश-बिंदु बनाकर पूरी कड़ी का पीछा करेगी: पश्चिम बंगाल का काम किसने ढूँढा, प्रस्ताव किसने मंज़ूर किए, ठेके किसने जीते, किन निजी संस्थाओं ने उन्हें पूरा किया, उन संस्थाओं का मालिक कौन था, भुगतान किसे हुआ, ख़र्च किसने मंज़ूर किए — और क्या वही बिचौलिये, वही ठेकेदार और वही मंज़ूरी देने वाले अधिकारी राज्यों और परियोजनाओं में बार-बार आते हैं। कोई नेटवर्क एक नियुक्ति-पत्र में अपनी घोषणा नहीं करता। वह पैटर्न में दिखता है।
सात सवाल जिनका जवाब वापकोस को देना ही होगा
1. क्या देबीदास दत्ता को नियुक्त किया गया — किसने, किसकी सिफ़ारिश पर, किस नीति के तहत?
2. मंज़ूरी कहाँ है — बोर्ड, सीएमडी या कोई नहीं?
3. उन्हें क्या भुगतान हो रहा है, और कैसे: शुल्क, रिटेनर, या जीते गए ठेकों में हिस्सा?
4. पश्चिम बंगाल में कौन-से असाइनमेंट लिए गए, और उन्हें किसने पूरा किया?
5. सुमिर चावला की भूमिका क्या थी, और उसे किसने अधिकृत किया?
6. क्या त्रिपाठी, लखनपाल या अग्रवाल ने इससे जुड़े किसी ख़रीद, परियोजना या भुगतान के निर्णय को छुआ?
7. एक बर्ख़ास्त सीएमडी की उत्तराधिकारी ने, जब सीबीआई इमारत के भीतर थी, एक पूर्व सीएमडी को फिर से क्यों रखा?
रिकॉर्ड पर क्या रखना होगा
· सीएमडी का कोलकाता यात्रा-कार्यक्रम और बैठकों के रिकॉर्ड।
· दत्ता की नियुक्ति का प्रस्ताव-फ़ाइल, उसकी मंज़ूरी, नियुक्ति-पत्र और पारिश्रमिक की शर्तें।
· पश्चिम बंगाल में लिया गया हर असाइनमेंट — ग्राहक, मूल्य, मंज़ूरी देने वाले अधिकारी, क्रियान्वयन करने वाली संस्थाएँ और उनके मालिक — तथा दत्ता, चावला या वापकोस के किसी अधिकारी से जुड़ी किसी भी संस्था को किए गए सभी भुगतान।
यह अख़बार माँग करता है
1. सीबीआई: एफआईआर RC2162026A0005 का दायरा एक अभियुक्त से आगे बढ़ाए — शिकायत-अभिलेखों और राजस्थान एफआईआर 51/2023 में नामित नेटवर्क तक, और दत्ता की नियुक्ति तथा उसके ज़रिये लिए गए हर ठेके तक।
2. सीवीसी: वापकोस के अपने विजिलेंस विंग से होकर नहीं, बल्कि स्वतंत्र जाँच — 2024 से नियुक्त हर सलाहकार, परामर्शदाता और वकील की: अधिकार, उचित-परिश्रम, पारिश्रमिक, सुविधाएँ — नियमित और संविदा कर्मचारियों के वेतन के सामने रखकर।
3. जल शक्ति मंत्रालय: दत्ता की फ़ाइल सात दिन के भीतर रिकॉर्ड पर रखे — या बताए कि वह है ही नहीं।
घटनाक्रम
13.04.2023 — मूल शिकायत में चावला, बोहिदार, अवतार सिंह, भारद्वाज और वापकोस/एनपीसीसी के अन्य अधिकारियों के नाम।
2023 — राजस्थान एफआईआर 51/2023: फ़र्ज़ी वापसी-पत्र, धमकी; अग्रवाल और चावला नामित।
अग्रवाल बर्ख़ास्त — सीएमडी पद से; शिल्पा शिंदे ने कार्यभार संभाला।
28.04.2026 — वापकोस और एनपीसीसी द्वारा सीबीआई को संदर्भ की रिपोर्ट; चावला, प्रदीप कुमार, लखनपाल, त्रिपाठी विजिलेंस रडार पर।
30.04.2026 — सीबीआई एफआईआर RC2162026A0005: अग्रवाल, अकेले अभियुक्त।
2026 — सीएमडी की कोलकाता यात्रा; दत्ता की पश्चिम बंगाल लायज़न के रूप में कथित पुनर्नियुक्ति। कोई फ़ाइल नहीं दिखाई गई।
15.10.2026 — यह रिपोर्ट। सवाल भेजे गए; जवाब नहीं।
जवाब का अधिकार
द न्यूज़ वॉइस ऑफ इंडिया ने वापकोस की सीएमडी शिल्पा शिंदे, पूर्व सीएमडी देबीदास दत्ता, अमिताभ त्रिपाठी, दीपक लखनपाल, रजनीकांत अग्रवाल, सुमिर चावला और जल शक्ति मंत्रालय को इस नियुक्ति, इसकी मंज़ूरी और शर्तों, बिचौलिये, पश्चिम बंगाल के असाइनमेंट, निजी संस्थाओं, सार्वजनिक धन की आवाजाही और सलाहकारों व कर्मचारियों के वेतन-अंतर पर लिखा है। कोई भी जवाब पूरा छापा जाएगा। वापकोस यह मामला एक दिन में ख़त्म कर सकता है — फ़ाइल दिखाकर।
कोई कंपनी आपस में जुड़े लेन-देन की कड़ी को अलग-अलग प्रशासनिक निर्णयों की शृंखला बताकर यह उम्मीद नहीं कर सकती कि उस पर यक़ीन किया जाएगा। अगर कोई नेटवर्क है, तो जवाबदेही को उसका पीछा करना होगा — पहुँच और नियुक्ति से लेकर अवार्ड, उप-ठेका, भुगतान और लाभार्थी तक — और जनता को यह जानने का हक़ है कि यह क्या था: लायज़न, या कड़ी।
स्रोत: कड़वा सत्य (28.04.2026); सीएनएन कैमी नेट न्यूज़ (15–31 मई 2026); इलस्ट्रेटेड डेली न्यूज़ (03.06.2026); द न्यूज़ वॉइस ऑफ इंडिया, संस्करण 218।





